झारखंड के कुछ आदिवासी व्यंजन, स्वाद ऐसा कि हर बार खाने का मन करे

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झारखंड के आदिवासियों का भोजन काफी पौष्टिक और प्राकृतिक होता है। यह सहेत के लिए फायदेमेंद माना जाता है। कभी झारखंड आइए तो इनके व्यंजन का स्वाद जरूर लीजिए। आज हम आपको बता रहे झारखंड के आदिवासियों के सात व्यंजन के बारे में।

पहाड़ों और जंगलों से घिरे झारखंड की चर्चा यहां के आदिवासियों की जीवनशैली की चर्चा के बिना अधूरी है। यहां 32 प्रकार के आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं। सुदूर गांवों में इनकी जीवनशैली अब भी पुरातन है। प्रकृति के उपासक यह समाज पूरी तरह से प्रकृति पर ही निर्भर है। यहां के जंगलों में कई ऐसी चीजें मिलती हैं जिनका यह प्रिय भोजन होता है। इसके अलावा इनके घरों का पकवान भी विशिष्ठ शैली होता है। आइए, आज बात करें इनके कुछ खास व्यंजन के बारे में।

साल के पत्तों में पकाते हैं देसी बिरयानी

झारखंड के कोल्हान प्रमंडल में सबसे अधिक संख्या में हो आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं। इनके घरों में एक खास प्रकार की देसी बिरयानी तैयार होती है- पोड़ाम जिल्लू-पतपुड़ा मीट या लड जिल्लू। चावल और मीट आदि को मिक्स कर साल के पत्तों में इसे पैक कर दिया जाता है। फिर इसे आग पर पकाया जाता है। इसका स्वाद लाजवाब होता है। इसे स्थानीय लोग देसी बिरयानी के नाम से भी पुकारते हैं। चूंकि यह इलाका सारंडा जंगल का है, सो यहां बड़े पैमाने पर साल के पेड़ पाए जाते हैं। इन्हीं साल के बड़े बड़े पत्तों में यह व्यंजन तैयार होता है। पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा शहर में इस व्यंजन की कई दुकानें मिल जाएंगी।

नॉन वेज से भी स्वादिष्ट शाकाहारी रुगड़ा की सब्जी

झारखंड के रांची, खूंटी, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, सिंहभूम, चतरा जिले में बड़े पैमाने पर रुगड़ा पाया जाता है। यह छोटे-छोटे आलू की तरह होता है। यह मशरूम की एक प्रजाति है। जमीन के नीचे पाया जाता है। साल के पेड़ के पास जमीन में दरार देखकर आदिवासी इसे पहचान लेते हैं। बारिश के मौसम में यह पाया जाता है। मटन और चिकेन की तरह ही इसे पकाया जाता है। यह काफी पौष्टिक होता है। यह 800 से 300 रुपये किलो बाजार में बिकता है। इसमें प्रोटीन और फाइबर अधिक होता है। फैट और कैलोरी कम। शाकाहारी लोग इसे बेहद पसंद करते हैं। यह दो प्रकार का होता है- चंदना रुगड़ा और सफेद रुगड़ा।

सुबह के नाश्ते में धुस्का का स्वाद लेना न भूलें

धुस्का आदिवासियों का बेहतरीन नाश्ता है। यह चावल, चना दाल, उड़द दाल, जीरा, लाल मिर्च पाउडर, हल्दी पाउडर, बैकिंग सोडा से तैयार होता है। चावल, चने की दाल और उड़द दाल को दो से तीन घंटे पानी में भिंगोकर रख दिया जाता है। इसके बाद इसे पीसकर बारीक कर लिया जाता है। इसमें जीरा, लाल मिर्च पाउडर, नमक, हल्दी पाउडर और बेकिंग सोडा को मिला दिया जाता है। इसके बाद तेल में इसे गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई किया जाता है। इस तरह यह खाने के लिए तैयार हो जाता है। इसे आप चटनी या सब्जी के साथ खा सकते हैं।

मोमो की जगह खाइए चावल का स्वादिष्ट पीठा

आदिवासी समुदाय के लोग पर्व त्योहार के मौके पर चावल का पीठा बनाते हैं। यह झारखंड का स्वादिष्ट व्यंजन माना जाता है। यह झारखंड के सभी जिलों में सभी आदिवासी घरों में तैयार होता है। चावल के आटा से यह तैयार होता है। इसमें दाल और सब्जी भरी होती है। कई जगह इसमें नारियल, गुड़ और तिल भी भर कर बनाया जाता है। इसे मीठा पीठा कहा जाता है। इसे आदिवासी लोग धनिया की चटनी और लहसुन की चटनी के साथ खाना पसंद करते हैं। यह बाजार में नहीं बिकता है, अगर खाने की इच्छा है तो किसी आदिवासी परिवार से संपर्क साधना होगा।

सेहत के लिए फायदेमंद बांस की सब्जी

आदिवासी घरों में बासं के नर्म अंकुरों से सब्जी बनाई जाती है। बनाने से पहले इसे काटकर छोटा छोटा पीस बना लिया जाता है। इसे पानी में डालकर पहने उबाला जाता है। इसके बाद लहसुन, अदरक और अन्य मसाले डालकर इसे सब्जी की तरह पकाया जाता है। पानी में उबाल देने से यह कड़वा नहीं लगता है। आदिवासी समुदाय की महिलाएं बांस की नर्म अंकुर बाजार में बेचती नजर आती हैं। इसे गैर आदिवासी भी पसंद करते हैं। यह काफी पौष्टिक व्यंजन माना जाता है।

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